पृथ्वी माता के कल्याण के लिए प्रार्थना

परमात्मा जी तुम मेरे दिल में आ गए। तुमने मुझे अद्भुत प्रेम दिया ।हे परम पिता परमात्मा जी ये प्रेम तो मैंने तुमसे माता पृथ्वी के कल्याण के लिए मांगा था। परमात्मा जी आत्म चिंतन करते हुए तुमसे प्रार्थना की थी कि हे मेरे स्वामी भगवान् नाथ आज प्राणी के अनतर ह्दय में प्रेम और सद्भावना नहीं रही। हे परमात्मा जी मै तुमको अन्तर्मन से प्रार्थना करती हूं। कि हे स्वामी भगवान् नाथ तुमने मुझे जो प्रेम दिया है। प्रेम की खुश्बू से पृथ्वी माता लहराये प्रेम प्राणी मात्र के दिल में समा जाए। साधक आत्म चिंतन करते हुए अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगता। क्योंकि आत्म चिंतन करते हुए संसारिक सुख गौण है। उसकी प्रार्थना तो जन जन के कल्याण के लिए होती है। साधक आत्म चिन्तन करते हुए कहता है कि हे मेरे प्रभु स्वामी भगवान् नाथ मेरे पास ये थोड़ी सी साधना है। मै तुम्हे समर्पित करता हूं जिस से देश और राष्ट्र की सुरक्षा हो जाए। साधक के दिल में एक ही चाहत होती है कि मैं पृथ्वी पर परमात्मा का चिन्तन करने के लिए आया हूँ।परमात्मा ने मुझे आत्म चिंतन के लिए भेजा है। परम पिता परमात्मा पग पग पर साधक की रक्षा करने के लिए आते हैं। साधक चिन्तन में गहरी डुबकी लगाना चाहता है। परमात्मा जी ये सब तो तुम मुझे अपना मान कर करा रहे हो। हे परमात्मा जी ये सब तो आपकी कृपा पर निर्भर है ।
अनीता गर्ग

भगवान् बोलते हैं

हम मन्दिर जाते हैं मन्दिर के प्रागणं में शान्ति को महसूस करते हैं। हम शान्ति महसूस इसलिए करते हैं क्योंकि हमने अपने विचारों को कुछ समय के लिए रोक दिया। अन्तर्मन से हम सोचने लगे कि भगवान के दर्शन करेंगे। और हमारे अन्दर शान्ति समा गई। हमने मन्दिर मे भगवान के दर्शन किए। भगवान् से कुछ बात की मन्दिर में दर्शन करते हुए हम कहते हैं कि देखो भगवान् कितने अच्छे हैं। हम भगवान् को ह्दय में धारण करते हैं तब हमें मन्दिर में भगवान् अच्छे लगते हैं। हम कुछ स्तुति के द्वारा भगवान् से बात की और चल देते हैं।लेकिन मन्दिर मे जाकर भगवान् बोलते हैं
वो हम नहीं सुनते। भगवान् कहते हैं कि मेरी मुर्त तुझे इतनी शान्ति देती है। भगवान् कहते हैं कि ये मूर्त मेरा रूप और आकार नही है। मेरा रुप तो सृष्टि के कण कण में समाया है। मेरारुप तुझे कितनी शान्ति देगा। मेरे रूप में झुम जाएगा मुझमें मन लगा तो सही। तेरे रोम रोम में आन्नद समा जाएंगा। मैं तुझे मिट्टी और धातु के बने पुतले में दिखता हूँ। मेरे द्वारा रचित जग को मेरी नजरो से निहार कर देख हर दिल में मै ही समाया हू। लहराती हुई प्रकृति को देख जिसकी महक से दिल झुम जाता है। कल कल करती हवाएँ जब चलती ऐसे लगता है जैसे अनेको वीणाए अन्दर नाद बजा रही है ।चमकते हुए सुरज चांद सितारो में मै ही तो समाया हूँ।
सृष्टि के कण कण में मै ही तो समाया हूँ।
अनीता गर्ग

शान्ति मेरे अंदर समाई

‌परमात्मा ने मुझे पृथ्वी पर बना कर भेजा है। मै परमात्मा को याद करूँ या नही पर परमात्मा हर क्षण मेरे साथ है। मै बाहरी संसार में सुख ढुढता हूँ। मेरा सुख मेरे अंदर समाया है। मै शान्ति चाहता हूं। शान्ति कही बाहर नहीं शान्ति मेरे अंदर समाई है। मै अपने आप से बात करके अपनी ईच्छाओ को समय अनुकूल बना लेता हूँ। तो शान्ति मेरे अंदर समा जाएंगी। शान्ति कोई देता नहीं शान्ति हमे परमात्मा देकर भेजता है। हम परमात्मा का चित से चिन्तन करते हैं। हमारे अन्दर भाव और विचार की जागृति होने लगेगी। तब हमें प्रेम की परिभाषा समझ आती है। संसार में जो प्रेम दिखाई देता है वह लेन देन पर आधारित है। इसे प्रेम नहीं कहा जा सकता। प्रेम तो मीराबाई ने भगवान् कृष्ण से किया। मीराबाई ने अपना जीवन भगवान् के चरणों में समर्पित कर दिया ।प्रेम आत्मा की गहराई से किया जाता है। प्रेमी के ह्दय की एक ही पुकार होती है कि किस तरह से मेरे स्वामी भगवान् नाथ का बन जाऊँ।
‌ अनीता गर्ग

जगत पिता सबका मालिक

पृथ्वी पर कोई अकेला नहीं आता परमात्मा हर प्राणी के दिल में बैठा होता है। हम नासमझ बनकर कहते हैं कि प्राणी संसार में अकेला आता है और अकेला ही जाता है। हम संसार के भोतिक पदार्थों में उलझे रहते हैं। हमारे अन्दर मैं प्रवेश कर जाता है। हम संसार में आकर अनेक सम्बन्ध बनाते हैं। हम सम्बन्धो में अपनापन नहीं पाते शान्ति मिले तो कैसे मिले। क्योंकि सम्बन्धो का सम्बन्धी तो हमारे अन्दर बैठा होता है। जिस दिन परम सत्य के स्वरूप परम प्रकाश पुंज को ह्दय में चेतन रूप में निहारते है। उसी दिन हमे सब सम्बन्ध पूर्णतः लगते है। क्योंकि वह निराकार हमे हर प्राणी में दिखाई देता है। साधक के दिल में अपने स्वामी भगवान् नाथ से मिलने की तङफ हर क्षण बनी रहती है। साधक अन्तर्मन से प्रार्थना करते हुए कहता है कि हे परमात्मा जी मेरी हर क्रिया में तुम समा जाओं मैं तुम्हारे बैगर एक पल भी न रहु। हे मेरे स्वामी भगवान् नाथ दिल की हर धङकन में तुम समा जाओ।प्राणी संसार से जब जाता है तब परमात्मा का नामधन परमात्मा की पुकार परमात्मा की वह अनेक प्रकार से विनती और स्तुति करता है। ये सब करते हुए जब प्राणी का व्यवहार बदलता है। तब परमात्मा साधक की पुकार को सार्थक करता है। जगत पिता सबका मालिक हैं।
अनीता गर्ग

परमात्मा की स्तुति

साधक आखं बन्द कर के बैठ कर परमात्मा का चित से चिन्तन करते हुए सोचता है कि परमात्मा मेरे अंदर बैठा है।साधक के दिल में अद्भुत आन्नद समा जाता है। कुछ पल समय ठहर सा जाता है। साधक अपने आप को भुलाकर परमेश्वर स्वामी भगवान् नाथ का बन जाना चाहता है।हे परमात्मा जी मै तुम्हारा कैसे धन्यवाद करु ये सब तो आपकी कृपा का फल है।प्रभु तुम ही मेरे प्राण नाथ प्यारे हो। हे पुरण ब्रह्म परमेशवर मुझे तुम्हारी स्तुति और विनती नहीं करनी आती। हे जगत गुरु जगत के मालिक यदि तुम मुझसे स्तुति करवाना चाहते हो तो हे प्रभु तुम पहले मुझे स्तुति करनी सिखाओ। तभी मैं आपकी स्तुति कर सकता हूँ। हे परमात्मा जी मेरे तो सब कुछ करने और कराने वाले आप ही हो।क्योंकि मैंने तुम्हें अपने आप से भिन्न समझा ही नही। मेरे रोम रोम में तुम समाये हुए हो। जब साधक परमात्मा का बन जाता है तो साधक की हर क्रिया परमात्मा की स्तुति बन जाएगी। साधक जब कर्म करता है तो सजग होकर परमात्मा में डूबकर कर्म करता है। कर्म करते हुए साधक परमात्मा का जब चिन्तन करता है साथ में कार्य को बहुत शुद्ध विचार के साथ करता है तब साधक को ये समझना मुश्किल हो जाता है कि मै तो अपने प्रभु स्वामी भगवान् नाथ के चिन्तन में लिन था फिर भी इतने अच्छे तरीके से कार्य कैसे हुआ। अवश्य ही मेरे परमेशवर स्वामी भगवान् नाथ सहायक हुए हैं। कई बार तो ऐसा लगता है जैसे ये शरीर है ही नहीं। ये पुरण ब्रह्म परमेशवर स्वामी भगवान् नाथ ही कर्म कर रहे है।
अनीता गर्ग

कर्म के साथ भगवान् खड़े

‌कर्म जीवन की सच्चाई है। भगवान् कर्म के साथ खड़े है।हमे जीवन में सुरक्षा करनी है तो अपने कर्म की करनी है। कर्म सबसे बड़ा धन है। क्योंकि कर्म करके प्राणी के जीवन में जो सुख शांति और समरिधी आती है।वह शान्ति अन्य किसी भी साधन से नहीं आ सकती है ।कोई आप से धन मांगता है तो धन दे दो। धन जीवन की सच्चाई नहीं कर्म जीवन की सच्चाई है। एक बिमार व्यक्ति सेवा से ठीक होता है या नहीं पर कार्य करके अवश्य ठीक हो जाता है। कार्य करते हुए एक विश्वास जागृत होगा कि मैं बिमार नहीं हूँ। अन्तर्मन का विश्वास सबसे बड़ी दवाई है। पृथ्वी पर आकर जो भी बन कर गया है। वह सख्त परिश्रम करके ही बन कर गया है। हम कबीर दास जी रविदास जी और अनेक भक्तों जीवन चरित्र को पढते हैं तब पाते हैं कि इन्होंने ने अपने जीवन को बैठ कर नहीं बिताया है। कबीर दास जी कपङा बुनते हुए साखिंया गाते थे ।कर्म मार्ग के द्वारा साधक गहरे चिन्तन में उत्तर सकता है। क्योंकि कर्म के द्वारा साधक में विश्वास की दृढता शान्ति और हौसला बनता है।कर्म के साथ साधना करते हुए जिसने जीवन जीया है। भगवान् उसे बार बार दर्शन देने आए हैं। साधक कहता है कि भगवान जी मै पहले कर्तव्य को पुरा कर लु। एक कर्म निष्ठ व्यक्ति को कोई तोड़ नहीं सकता।क्योंकि उसके साथ भगवान् खङे होते हैं। राम जी और कृष्ण जी को हम भगवान् मानते हैं। राम जी और कृष्ण जी के जीवन चरित्र से शिक्षा ग्रहण नहीं करते। यही हम पीछे रह जाते हैं। हम तो राम राम और कृष्ण कृष्ण की रट लगा कर बैठे बैठे ही सब सुख चाहते है। भगवान् राम और कृष्ण जी जन जन के कल्याण में अपने जीवन को समर्पित कर के गए हैं।
‌ अनीता गर्ग

कर्म करते हुए परमात्मा का चिन्तन

भगवान् से आप मांगना चाहते हो तो कर्म को मांगो। कर्म सबसे बड़ा धन है। कर्मनिषठ व्यक्ति के होंसले और आत्मविश्वास के सामने विपत्ति ठहरती नहीं। जो पृथ्वी पर आकर कर्म के साथ मित्रता करता है। जीवन जीने की कला वही सिखता है। कर्मशील साधक भगवान् से कहता है कि हे भगवान् मेरे पास गृहस्थ धर्म का इतना कार्य है। मेरा पहला कर्तव्य घर के सब कार्य शुद्धता पुर्वक करना है। हे परमात्मा जी मै तुम्हारी पुजा अर्चना आज कर्म करते हुए एक बार कर लेता हूँ। कर्म करते हुए जब साधक परमात्मा का चिंतन करता है तब परमात्मा के ध्यान में  साधक को शरीर तक का ध्यान नहीं रहता साधक परमात्मा की अनेको स्तुति करता है। फिर भी दिल को चैन नहीं मिलता। कर्म करते हुए साधक परमात्मा को कभी गाकर कभी नाचकर भगवान को रिझाता है। साधक फिर अन्तर्मन से परमात्मा को नमन करता है।  तुम्हारे सामने दिपक से आरती करने में लेट हो जाएगी। मुझे तुम क्षमा कर देना कल मै जल्दी आरती करुगा। हे परमात्मा जी मै कपड़े वॉश करते हुए ही नाम जप कर लेता हूँ। हे परमात्मा जी सुबह से आपकी कितने ही सच्चे साधक पुजा और अर्चना कर के गए होंगे। मैं भी नमन और वन्दन कर लेता हूँ। हे परमात्मा जी सुबह से आप खङे खङे थक गए होंगे मै Tea पी रहा हूँ। मेरी थोड़ी सी Tea आप पिलो जिससे आपकी थकान उतर जाएगी। साधक ऐसे अन्तर्मन से परम पिता परमात्मा से बात करता है।                                                                                                             अनीता गर्ग

दर्शन की प्रार्थना फिर से करना

हे मेरे भगवान् मै तुम्हारा किस तरह से धन्यवाद करु। मुझे ये समझ नहीं आ रहा। हे परमात्मा जी तुम मेरे साथ हर पल रहे। हे परमात्मा जी तुम ने मुझे बार बार दर्शन कराया। मुझ में प्रेम जागृत किया। तुमने मुझे ज्ञान प्रदान किया। लेकिन प्रभु प्राण नाथ जहाँ जीवन है वहां मृत्यु भी है। संसार में सत्य है तो वह मृत्यु है। परमात्मा जी तुम ने मुझे उन सबका ज्ञान कराया जो जानने योग्य था। हे परमात्मा जी मुझ मे ही खोट था। मै तुम्हारी साधना पूर्ण नहीं कर पायी। शायद मुझमे अहम आ गया था।                                                                                                   हे परमात्मा जी हे ब्रह्मानन्द जी हे स्वामी हे प्राण नाथ मै शिश झुकाकर प्रार्थना करती हूँ। मुझ से कुछ भुल हुई होगी। मैंने कुछ तो पाप किया होगा। मेरे दिल में पवित्रता नहीं रही होगी। हे परमात्मा जी वह कोन सी घङी होगी जब मैं तुम्हारे चिन्तन में पूरण डुब जाऊगी। मै मै न रहकर परम पिता परमात्मा की बन जाऊगी। हे परमात्मा जी ऐसा तो तभी संभव है जब तुम मुझे अपने मे समा लोगे। प्रभु तुम दिल में आते हो, प्रेम बरसाते हो। एक बार साधक परम प्रभु के दर्शन कर लेता है। साधक अपने स्वामी भगवान् नाथ के बैगर एक पल भी रह नहीं सकता। हृदयके अन्दर दर्द की एक लहर दौड़ जाती है। हे नाथ तुम कब आओगे साधक उठते-बैठते परमात्मा के सामने मस्तक नवाकर प्रार्थना करता है।कि हे स्वामी भगवान् नाथ मै तो आपको ही जानता हूँ। हे परमात्मा जी तुमने मुझे जब से पृथ्वी पर भेजा मै तो तब से आपको ध्याता रहा। मेरे माता पिता स्वामी सखा आप ही हैं। साधक कहता है कि मैंने पृथ्वी पर आकर इतना ही जाना। सब में तु ही समाया है। हे परमात्मा जी मै तुम्हे नमन और वन्दन करती हूँ।
अनीता गर्ग

सर्वस्व समर्पित

भक्त भगवान कोअपना सर्वस्व समर्पित कर देता है। भगवान से मांगने की कोई इच्छा नहीं बस सम्पर्ण सम्पर्ण। भक्त भगवान को दिल में बिठा कर रखता है। कभी भजन गाकर रिझाता है कभी नाम जप करता अनेक प्रकार से विनती स्तुति नमन और वंदना करता है। भगवान का चिन्तन करते करते कब ध्यान मार्ग आ जाएगा भक्त को ग्यात नहीं। भजन जब लम्बी तर्ज करके गाते है। गाते हुए बीच में सांस को अन्दर थाम लेते है ये भी योग है। भजन गाते हुए प्रफुलित होते है ये आनन्द मार्ग है।अनजाने में परमात्मा के एक नाम का सोते, जागते, उठते, बैठते ,चलते हुए ,खाते हुए उच्चारण करते है ये जप है। एक भक्त को माला,मूर्ति आसन किसी चीज की आवश्य्कता नहीं। आवश्य्कता है तो पुकार और लगन की है। परमात्मा का चिन्तन करते हुए मस्तक पर,आँखो में रोम रोम में प्रकाश झलकने लगता है। भक्त अकेला नहीं परमात्मा साथ रहता है।
अनीता गर्ग

काल कोठरी

साधक परमात्मा से बात करते हुए कहता है कि हे परमात्मा जी ये हाड मास की काया है। मुझे इस काया में एक भी शुभ गुण दिखाई नहीं देता। यह विकारों से भरी हुई काल कोठरी है। साधक कहता है कि इस कोठरी को कितना ही खिलाओ पिलाओ इस की भुख शान्त होने वाली नही है। इस कोठरी को भक्ति की ज्योत से उजागर करना है। जिस से इस मे शान्ति स्थापित हो जाए। यह दिन प्रति दिन बिगड़ती ही जाती है। राम नाम का रस ऐसा मिठा हैं। राम नाम के रस को पीने पर जन्म जनमान्तर की भुख शान्त हो जाती है। जिसने भुल से भी एक बार राम नाम का रस पी लिया उसके लिए संसार के सब पदार्थ फीके हैं। राम नाम का रस पीने वाला सबसे पहले कर्तव्य में अपने भगवान् को ढुंढता है। साधक कहता है कि मेरे कर्म में मेरा भगवान् छुपा बैठा है। भगवान् साधक की कर्म निष्ठा की, समर्पण भाव की सत्यता की अनेक बार परिक्षा लेते हैं। तब कहीं भगवान साधना मार्ग साधक को देते हैं।
अनीता गर्ग