परमात्मा को देखने की चाहत

हे परम पिता परमात्मा जी मै तुमको बार बार नमन और वन्दन करती रहूँ। हे स्वामी भगवान् नाथ तुमने इस शरीर को बनाया है। ये मन बुद्धि तुम्हारी बनाई हुई है। इस शरीर के अन्दर यथा योग्य जो चाहिए था वह सब कुछ बनाया। हे स्वामी तुमने बाहरी सुख भी सब दीए। लेकिन एक दिन ऐसा आता है। जब प्राणी के ह्दय में तङफ पैदा हो जाती है। तब वह सोचता हूँ कि देख परमात्मा ने मुझे सब कुछ देकर भी कुछ नहीं दिया। मेरे दिल को चैन मिले तो कैसे मिले। जिस परमात्मा ने मुझे बनाया है। उस परम प्रभु को मैं जी भरकर जीते जी देख लु उसमे समा जाऊ। मै अपने परम प्रभु की बन जाऊं। मेरा सच्चा मालिक तो मेरा परमात्मा ही है। ये बाहरी सम्बन्ध तो लेन देन पर अधारित है। सच्चा सम्बन्ध तो तेरा उस परम पिता परमात्मा, परमेशवर स्वामी भगवान् नाथ से है। तु जीवन भर भुला फिरता है। मै फिर बैठ कर सोचती हूँ। दिल मे तङफ की लहर दौड़ जाती है।अहो जीवन अब थोड़ा ही रह गया। जीतेजी मै एक बार मेरे स्वामी भगवान् नाथ की बन जाऊ। अपने परमेशवर स्वामी भगवान् नाथ को दिल मे बिठाकर नयन मुदं लु और पूणतः तृप्त हो जाऊं।
अनीता गर्ग

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