मन ही मन में चिंतन करते

परमात्मा ह्दय के भाव और प्रेम में छुपा हुआ है। आज हम पुजा भी करते हैं तो दिखा कर करते हैं। परम प्रकाश रुप के सामने दिखावा नहीं चलता। उसे तो प्रेम से सिंचा जाता है। आज सभी पढने की दोङ में लगे हैं। अध्ययन और चिंतन का मार्ग गोण होता जा रहा है। हम कुछ स्तुति पढते एक दो पाठ करते कुछ भजन गाते थे। भगवान् के आगे हाथ जोड़ कर शिश झुकाते थे। और दिन भर काम करते जाते ओर इन्हीं सबको मनही मन में अध्यन चिन्तन और मन्न करते रहते थे। हमे ज्ञात ही नहीं कि हमारे अन्दर भाव की द्रीढता इतनी गहरी है। कि हम कब भाव विभोर हो दिल में भगवान् को बिठा बैठे। कब वन्दन करते और कब नमन कर देते। यह भारतीय संस्कृति थी। घर पर विपत्ति आतीं और टल जाती। घर के बङे भगवान् की प्रार्थना सुबह से शाम तक करते और सब कुछ ठीक हो जाता था।
‌ अनीता गर्ग

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *