आत्म चिंतन

परमात्मा साधक को बार बार आनंद से तृप्त करना चाहते हैं। आन्नद दिल में ठहरता नहीं। साधक जानता है कि यह बाहर का मार्ग है। आन्नद चिन्तन में बाधा उत्पन्न करता है। साधक अपने परम पिता परमात्मा से हाथ जोड़कर शिश झुकाकर प्रार्थना करता है कि हे स्वामी हे परमात्मा जी मै तुम्हारा चिन्तन करना चाहता हूं। आत्म चिंतन सबसे बड़ी शान्ति है। आत्म चिंतन में साधक शरीर से गोण है। आत्म चिंतन में साधक परम पिता परमात्मा से मानसिक रूप में बात करता है। अपने भगवान् का अन्तर्मन से चिन्तन मन्न और वन्दन करते हुए श्वांस श्वांस से ध्याना चाहता है । साधक के दिल में एक ही तङफ होती है। कि कैसे मेरे स्वामी भगवान् नाथ का बन जाऊं। पग पग पर पहरेदार खङे होते हैं। जरा सी चूक हुई कि साधक की साधना में बाधा डालने आ जाते हैं। आत्म चिंतन में गृहस्थ धर्म बाधा नहीं डालता। आत्म चिंतन ह्दय की गहराई से किया जाता है।आत्म चिंतन परम पिता परमात्मा की कृपा पर निर्भर है।साधक के दिल में आत्म चिंतन चलता रहता है।
अनीता गर्ग

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