परमात्मा की स्तुति

साधक आखं बन्द कर के बैठ कर परमात्मा का चित से चिन्तन करते हुए सोचता है कि परमात्मा मेरे अंदर बैठा है।साधक के दिल में अद्भुत आन्नद समा जाता है। कुछ पल समय ठहर सा जाता है। साधक अपने आप को भुलाकर परमेश्वर स्वामी भगवान् नाथ का बन जाना चाहता है।हे परमात्मा जी मै तुम्हारा कैसे धन्यवाद करु ये सब तो आपकी कृपा का फल है।प्रभु तुम ही मेरे प्राण नाथ प्यारे हो। हे पुरण ब्रह्म परमेशवर मुझे तुम्हारी स्तुति और विनती नहीं करनी आती। हे जगत गुरु जगत के मालिक यदि तुम मुझसे स्तुति करवाना चाहते हो तो हे प्रभु तुम पहले मुझे स्तुति करनी सिखाओ। तभी मैं आपकी स्तुति कर सकता हूँ। हे परमात्मा जी मेरे तो सब कुछ करने और कराने वाले आप ही हो।क्योंकि मैंने तुम्हें अपने आप से भिन्न समझा ही नही। मेरे रोम रोम में तुम समाये हुए हो। जब साधक परमात्मा का बन जाता है तो साधक की हर क्रिया परमात्मा की स्तुति बन जाएगी। साधक जब कर्म करता है तो सजग होकर परमात्मा में डूबकर कर्म करता है। कर्म करते हुए साधक परमात्मा का जब चिन्तन करता है साथ में कार्य को बहुत शुद्ध विचार के साथ करता है तब साधक को ये समझना मुश्किल हो जाता है कि मै तो अपने प्रभु स्वामी भगवान् नाथ के चिन्तन में लिन था फिर भी इतने अच्छे तरीके से कार्य कैसे हुआ। अवश्य ही मेरे परमेशवर स्वामी भगवान् नाथ सहायक हुए हैं। कई बार तो ऐसा लगता है जैसे ये शरीर है ही नहीं। ये पुरण ब्रह्म परमेशवर स्वामी भगवान् नाथ ही कर्म कर रहे है।
अनीता गर्ग

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