कर्म करते हुए परमात्मा का चिन्तन

भगवान् से आप मांगना चाहते हो तो कर्म को मांगो। कर्म सबसे बड़ा धन है। कर्मनिषठ व्यक्ति के होंसले और आत्मविश्वास के सामने विपत्ति ठहरती नहीं। जो पृथ्वी पर आकर कर्म के साथ मित्रता करता है। जीवन जीने की कला वही सिखता है। कर्मशील साधक भगवान् से कहता है कि हे भगवान् मेरे पास गृहस्थ धर्म का इतना कार्य है। मेरा पहला कर्तव्य घर के सब कार्य शुद्धता पुर्वक करना है। हे परमात्मा जी मै तुम्हारी पुजा अर्चना आज कर्म करते हुए एक बार कर लेता हूँ। कर्म करते हुए जब साधक परमात्मा का चिंतन करता है तब परमात्मा के ध्यान में  साधक को शरीर तक का ध्यान नहीं रहता साधक परमात्मा की अनेको स्तुति करता है। फिर भी दिल को चैन नहीं मिलता। कर्म करते हुए साधक परमात्मा को कभी गाकर कभी नाचकर भगवान को रिझाता है। साधक फिर अन्तर्मन से परमात्मा को नमन करता है।  तुम्हारे सामने दिपक से आरती करने में लेट हो जाएगी। मुझे तुम क्षमा कर देना कल मै जल्दी आरती करुगा। हे परमात्मा जी मै कपड़े वॉश करते हुए ही नाम जप कर लेता हूँ। हे परमात्मा जी सुबह से आपकी कितने ही सच्चे साधक पुजा और अर्चना कर के गए होंगे। मैं भी नमन और वन्दन कर लेता हूँ। हे परमात्मा जी सुबह से आप खङे खङे थक गए होंगे मै Tea पी रहा हूँ। मेरी थोड़ी सी Tea आप पिलो जिससे आपकी थकान उतर जाएगी। साधक ऐसे अन्तर्मन से परम पिता परमात्मा से बात करता है।                                                                                                             अनीता गर्ग

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