साधक को अपने में गुण दिखाई नहीं देता

साधक कहता है कि मैं चाहे कितना ही परमात्मा का चिन्तन, मन्न और वन्दन करता हुआ ध्यान लगाऊ। फिर भी मुझमे कुछ विशेषता दिखाई नहीं देती। मैंने अपनी बहुत खोज बीन कर ली। मुझमें एक भी शुभ गुण दिखाई नहीं देता। परमात्मा का नाम मैंने सच्चे मन से नहीं लिया। काम क्रोध लोभ मोह माया मुझमें समाये हुए हैं। मेरे मार्ग में अभी सच्चाई नहीं आयी। मैंने परम पिता परमात्मा ने मुझको अभी पुरणतः अपनाया नहीं है। जब तक प्राणी के अन्दर विकार है। वह सन्त कहलाने के योग्य नहीं है। प्राणी को अपनी खोज करते रहना चाहिए। साधक अपने आप को साध कर आगे बढ़ सकता है। साधना का मार्ग तप का मार्ग हैं। परमात्मा साधक को आन्नद से तृप्त करना चाहते हैं। जिससे साधक यही ठहर जाए। साधक परमात्मा के सामने हाथ जोड़कर शिश झुकाकर प्रार्थना करता है कि हे परमात्मा जी अभी मेरे अन्दर पवित्रता नहीं आयी है। मै आनंद को ग्रहण करने के योग्य नहीं हूँ। हे परमात्मा जी पहले ये आत्मा शुद्ध हो जाए। ऐसा अन्तर्मन से परमात्मा का चिन्तन करता है।                                                    अनीता गर्ग

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