सर्वस्व समर्पित

भक्त भगवान कोअपना सर्वस्व समर्पित कर देता है। भगवान से मांगने की कोई इच्छा नहीं बस सम्पर्ण सम्पर्ण। भक्त भगवान को दिल में बिठा कर रखता है। कभी भजन गाकर रिझाता है कभी नाम जप करता अनेक प्रकार से विनती स्तुति नमन और वंदना करता है। भगवान का चिन्तन करते करते कब ध्यान मार्ग आ जाएगा भक्त को ग्यात नहीं। भजन जब लम्बी तर्ज करके गाते है। गाते हुए बीच में सांस को अन्दर थाम लेते है ये भी योग है। भजन गाते हुए प्रफुलित होते है ये आनन्द मार्ग है।अनजाने में परमात्मा के एक नाम का सोते, जागते, उठते, बैठते ,चलते हुए ,खाते हुए उच्चारण करते है ये जप है। एक भक्त को माला,मूर्ति आसन किसी चीज की आवश्य्कता नहीं। आवश्य्कता है तो पुकार और लगन की है। परमात्मा का चिन्तन करते हुए मस्तक पर,आँखो में रोम रोम में प्रकाश झलकने लगता है। भक्त अकेला नहीं परमात्मा साथ रहता है।
अनीता गर्ग

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